बेजुबान का प्यार

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देख चोखट पे महाराज को

दर्शन को ललाईत हुआ बालक

पैर छुए , सिर झुकाया उनको

खूब आर्शीवाद पाए बालक

बालक को अपना हमजोली जान

महाराज ने छाती से लगा लिया

शायद ढूँढ रहा कोई साथी

तभी तो बालक को अपना बना लिया

आई जब बालक की मैया

बापिस बालक ले जाने को

कैसे भी न माने महाराज

कहे माँ को खाली लोट जाने को

यूँ ही कई देर तक महाराज

करता रहा इनकार

गले में बाहें डाल बालक के

यूँ जताए रहने दो मेरे पास

यहाँ कदम कदम पे मिलता धोखा है

वहीं इस बेजुबान का प्यार देखो कितना अनोखा है

निस्वार्थ प्रेम की ये होते मिसाल हैं

जबकि इंसानों के प्रेम पे तो उठते रहते सवाल हैं

फिर भी मैं यही कहूँगी कि……..

बेजुबानों में भी भावनाएँ पूरी होती हैं

मगर बच्चे की सुरक्षा भी जरूरी होती है

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

 

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क्या मैं वाकई… तेरा रूप हूँ ?

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माँ , तेरे नवरात्रे आ गए हैं | वे भी पूजेंगें मुझे, जिनको अपने घर में बेटी नहीं चाहिए |

हाँ , कंजक चाहिए बस आज के लिए, ढूँढ-ढूँढ कर लायेंगें मुझे पर बेटी  नहीं चाहिए |

क्यूंकि मैं तेरा रूप कही जाती हूँ न इसलिए मेरे पैर पखारे जायेंगें ,मेरे सामने पकवान

परोसे जाएँगें और जाते हुए मेरे से आर्शीवाद भी लिया जाएगा |

माँ, क्या वाकई मैं……….तेरा…….. रूप हूँ ?

गर हूँ तो फिर……

क्यूँ मैं दुर्गा बन नहीं पाती जब मैं जीना चाहती हूँ पर

मुझे कोख में ही मार दिया जाता है

क्यूँ मैं चंडी बन नहीं पाती जब कोई दरिंदा मुझ दुधमुही को

फूल समझकर उठा ले जाता है

क्यूँ मैं ज्वाला बन नहीं पाती जब मुझे नोच-नोचकर

पैरों तले कुचल दिया जाता है

क्यूँ मैं कालिका  बन नहीं पाती जब मेरी देह के साथ आत्मा को भी

लहुलुहान कर दिया जाता है

क्यूँ मैं चामुण्डा बन नहीं पाती जब मुझ मासूम को गुड़िया समझ

तार-तार कर दिया जाता है

माँ, क्या वाकई मैं……….तेरा…….. रूप हूँ ? शायद हूँ |

हूँ मैं तेरा रूप लेकिन सिर्फ आज |

आज तो तेरा भक्त मुझे पूजेगा और

कल न जाने कौन दरिंदा…………..

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

 

 

 

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आधा-अधुरा आईना

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इक दिन आईने ने मुझसे पूछा :

क्यूँ बार-बार मेरे सामने आ रही हो ?

हैरान होकर , क्यूँ इतना मुझे निहार रही हो ?

बताया न  तुम्हें कि तुम……….. खूबसूरत हो

सुन्दरता की……. प्यारी सी……… मूरत हो

मैंने बोला :

क्या लगा तुम्हें……  मैं अपनी खूबसूरती जानने आई हूँ

सामने आ तुम्हारे मैं तो………. तुम्हें पहचानने आई हूँ

आईना गर्व से बोला :

बेमतलब मेरे सामने कोई आता नहीं

बिना मुझसे मिले, बाहर कोई जाता नहीं

आ सामने मेरे, इतना सब इतरातें हैं

देख खुद को मुझमें, इतना वो इठ्लातें हैं

मैंने बोला :

जितने भी आईनों से पूछा, सब यही बोलते हैं

सब अपने में एक जैसी ही खूबसूरती को तोलते हैं

तुम भी उन्हीं में से हो….. जो बाहरी खूबसूरती को तोलते हैं

आधे-अधूरे हैं सब…….जो भीतरी खूबसूरती के लिए कुछ नहीं बोलते हैं

तुम मेरे काम के नहीं…. क्यूंकि बाहरी खूबसूरती तो कोई भी बता दे

चाहती हूँ वो आईना …….जो मेरे अन्दर की खूबसूरती मुझे दिखा दे |

∼ लक्ष्मी मित्तल

 

 

WhatsApp Image 2018-10-02 at 1.04.38 PMगर विद्या का मंदिर… अपना   फ़र्ज़…

ईमानदारी…… से….. निभाए

बापू की बन्दूक….. बालक को ….

यूँ……. आँख…… न….. दिखाए

∼ लक्ष्मी मित्तल 

मेरी जुर्रत (28 SEPT 2018)

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लता मंगेशकर जी किसी परिचय की मोहताज नहीं

उनकी आवाज़ की खूबसूरती को वयां करें, मेरे शब्दों में वो साज नहीं

जो बता सकें कि……

हिंदुस्तान की सबसे मशहूर आवाज़ हैं वो

स्वर कोकिला, भारत रत्न का पहने ताज़ हैं वो

जो कह सकें कि……..

करोड़ों  दिलों को छूती, उनकी सुरीली आवाज़  है

जटिल धुनों पर भी सहजता, न जाने क्या महके हुए से राज़ हैं

जो गुनगुना सकें कि……..

गीतों के बहाने आपकी आवाज़, जादुई कालीन विछाती रहीं

चहलकदमी करते रहे कई फ़नकार, आप हर गाने को नंगे पैरों सजाती रहीं

जो व्यक्त कर सकें कि कैसे…..

यह गज़ब आवाज़, किसी ख़ास उम्र पड़ाव से बंधी नहीं है

इस उम्र में आकर भी यह, हर उम्र के लिए बनी है

जो वयां कर सकें कि…..

यह ज़ादू शब्दों में बंध नहीं सकता, फिर भी मैंने हिमाकत कर डाली

आज हम दोनों का जन्मदिवस है, अतः मैंने थोड़ी सी जुर्रत कर डाली

my heartfelt wishes to the Nightingale of India, LATA JI on her birthday

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

 

 

 

 

मेरा कोहिनूर

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तू मेरा  अभिमान  है, रब का दिया अनमोल वरदान है;

हरपल  मेरे  संग  रहना , तू मेरा अरमान  है |

तू मेरा नूर  है, तू मेरा सुकून है ;

पराई होकर भी पराया न होना, तो मेरा खून है |

तू  मेरी  हूर है तो , तू ही मेरा गुरुर है ;

हर बेटी, हर माँ , का हीरा, पर तू मेरा कोहिनूर है ..

तू मेरा कोहिनूर है |

∼ लक्ष्मी मित्तल 

तू भगवान किसका है ?

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कौन हिन्दू , कौन मुसलमान ,क्या जाति-धर्म , मैं नहीं मानता  ;

तू भगवान इनमें से , किसका है ,  मैं नहीं जानता |

नहीं जानता मुझे पैदा करने वाली कोख, हिन्दू की थी या मुसलमान की थी ;

जानता हूँ तो बस इतना कि मुझे दुनिया में लाने वाली मेरी माँ थी |

बाहर आया तो देखा , भगवान भी बंट गए हैं ;

कुछ हिन्दुओं के, कुछ मुसलमानों के , कुछ अन्य के हो गए हैं |

मैं तो नन्हा फ़रिश्ता हूँ , ज़्यादा नहीं जानता ;

गणेश हो , नानक हो , अल्लाह  हो या ईसा , अलग नहीं मानता |

रूप तेरे अनेक पर तू  इक ज्योति स्वरूप है ;

तू सबका , तेरे  सब  और  तू एक, सिर्फ एक है |

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

“कानून के हाथ यहां छोटे पड़ रहे हैं। मुझे चेक नहीं, इंसाफ चाहिए।”

 

कुकर्म करतें हैं पहले, फिर छिपते फिरते हैं

दरिन्दगी करतें हैं जब, तब क्यूँ नहीं डरते हैं

आज नहीं पकड़े गए मगर कल हाथ आ जाएँगे

कानून के हाथ आज छोटे पड़ गए लेकिन कल लंबे हो जाएँगे

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

बाईक ने खुदकुशी की

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पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने….. मुझे भी हिला डाला ;

इसलिए खुदकुशी करने का मन, मैंने बना डाला |

परेशानियों से घबराकर, मैं तो बिल्कुल टूट गई ;

ए इन्सां  !  तुम घबराना नहीं, मैं तो जिन्दगी से रूठ गई |

धड़कनें नहीं धड़कतीं मुझ में, इसलिए जाने का गम नहीं ;

गर मेरी जगह तुम होते, यह गम किसी भी गम से कम नहीं |

मैं सीमाओं को लांघ गई, तुम कभी यूँ लांघना नहीं ;

तू तो अनमोल है, अपने आपको कभी टांगना नहीं |

∼ लक्ष्मी मित्तल

आज इक फोटो करवा लें

fe4cf81a-8557-40ec-a242-071ea2ac9955कभी तूने हमको बनाया, आज हमने तुझे बनाया है

हम खुश हैं ………. तू अपने संग खुशियाँ लाया है |

सोच- समझ कर गढ़ता हमको, हमने भी मेहनत से गढ़ा है

जिस मिट्टी से हम बने, उसी  मिट्टी से तू बना है |

अब तो कुछ दिन, पलपल तुझे पूजा जाएगा

पकवान बनेगें तेरे लिए, शायद हमको भी कुछ मिल जाएगा |

हम खुश हैं ………

चलो हम आज कुछ खेलें , कुछ तेरे संग बतिया लें

कल न जानें कौन ले जाए तुम्हें, आज ही इक फोटो करवा लें |

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∼ लक्ष्मी मित्तल 

गया तो , तुम्हारा क्या गया ???

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जिम्मेवारी डालते रहो, एक – दूसरे पर ;

इलज़ाम लगाते  रहो, एक – दूसरे पर ;

गया तो किसी का चिराग़ गया, तुम्हारा क्या गया ;

तुम तो यूँ  ही रोटियां सेकते रहो, मौतों पर ….

 

एक पैर वाले पिता से पूछो, जिसका दूजा पैर भी चला गया ;

पूछो उस नन्ही जान से, पिता का इंतज़ार अभी खत्म न हुआ ;

गया तो किसी का चिराग़ गया, तुम्हारा क्या गया ;

तुम तो यूँ  ही रोटियां सेकते रहो, मौतों पर ….

 

होश गवां रहे दादा-दादी से पूछो, पोते की मरण खबर पा रहे ;

पूछो उन परिवारों से पूछो, तुम्हारी लापरवाही से , बच्चों को अपने गवां रहे ;

गया तो किसी का चिराग़ गया, तुम्हारा क्या गया ;

तुम तो यूँ  ही रोटियां सेकते रहो, मौतों पर ….

 

जांच का आदेश देकर,लगा लेते हो लाशों  की कीमत ;

देकर चंद कागज़ के टुकड़े , मान लेते अपनी गनीमत ;

सुधार लें इस सिस्टम को, तुम्हारे भेज़े में नहीं आएगा ;

भूल जाओगे इन चिरागों को, कल कोई और जाएगा ….

तुम तो यूँ  ही रोटियां सेकते रहो, मौतों पर ….

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

 

डर

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डर से डर मत……..

डर से डर मत,डर उतना तुझे डराएगा ;

जितना भागेगा डर से, डर उतना तुझे भगाएगा |

डट जा कहीं, रुक जा कहीं ;

डर, डरकर रुक जाएगा ;

जितना भागेगा डर से, डर उतना तुझे भगाएगा |

हिम्मत दिखा , सामना कर ;

डर देखना डर जाएगा ;

जितना भागेगा डर से, डर उतना तुझे भगाएगा |

जितनी तू ताकत  दिखाएगा , उतना कमज़ोर डर हो जाएगा;

फिर इक दिन ऐसा आएगा

तेरे बुलंद होंसलों के आगे

डर भी हारकर झुक जाएगा—2

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

आग से न खेलना (INFORMATIIVE FOR CHILDREN ALSO)

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“आग से न खेलना, चोट लग जाती है ”  बचपन में  बार-बार यही बताया जाता है |लेकिन मुंबई के क्रिस्टल टावर की विल्डिंग में लगी भयानक आग में, कैसे १० वर्ष की जेन सदावर्ते  ने अपनी सूझ वूझ और fire fighting  and disaster– management की सीख को mind में रखते हुए कई जानों को बचाया |यह एक वहुत  informative and inspiring कहानी है जिसे मैंने इस short kavita के जरिए बताना चाहा है |

छोटी – सी जेन सदावर्ते, मिसाल बन जाती है ;

आग से न खेलना, चोट लग जाती है |

वो नन्ही सी परी,  भयानक आग से गिरी ;

इक पल के लिए, सुन्न हो जाती है |

आग से न खेलना, चोट लग जाती है ||

काले धुएं का भवंडर , अफरा-तफरी सबके अन्दर;

नन्ही परी अपनी मासूमियत भूल जाती है |

आग से न खेलना, चोट लग जाती है ||

वो घुटन भरा माहोल, प्राणों को बचाने की होड़ ;

नन्ही परी, खुद खतरों के खिलाड़ी बन जाती है |

आग से न खेलना, चोट लग जाती है ||

cotton के गीले कपड़े,  air purifier बने टुकड़े ;

मुंह पर रखने की, सलाह देती जाती है |

सांस लेने में दिक्कत, कम हो जाती है ||

आग से न खेलना, चोट लग जाती है ||

fire fighting की सीख, बनी आज उसकी जीत ;

अपनी सूझ-वूझ से, आग से भी लड़ जाती है |

आग से न खेलना, चोट लग जाती है ||

आग से न खेलना, चोट लग जाती है ||

∼ लक्ष्मी मित्तल 

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मेरे गुरु—– मेरे माता-पिता(Teachers’ Day)

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गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही  शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम ।

लेकिन मेरे साक्षात् गुरु मेरे माता-पिता हैं |आज Teachers’ Day पर मैं अपने प्रथम गुरुको इस कविता के माध्यम से नमन करना चाहती हूँ ………….

प्रथम गुरु मात-पिता को, मेरा शत्-शत् नमन

सब दुःख खुद सहकर, देते सुखमय जीवन…………….

बचपन में उंगली पकड़, जिन्होंने चलना सिखाया ;

उम्र के हर पड़ाव पर, जिन्होंने संभलना सिखाया ;

सही क्या है? गलत क्या  है?, जिन्होंने सब बताया ;

जीवन के हर उतार-चढ़ाव में, जिन्होंने साथ निभाया ;

 

आज के दिन, उनके लिए’ प्रभु से मेरी प्रार्थना….. 

 

दिल से विनती उससे, जिसने संसार रचाया;

उन ममतामयी आंचल की, हरपल मिलती रहे छाया ||

∼लक्ष्मी मित्तल 

तकदीर जगेगी|(कृष्ण भजन )

आज जन्माष्टमी है | सिर्फ भक्त ही नहीं इंतज़ार कर रहे भगवान का, बल्कि भगवान भी अपने भक्तों के घर आने के लिए उतावले हैं …………

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मुझे भक्तों घर जाना है……..थोड़ा देर लगेगी ;

उन्हें अपना बनाना है………. थोड़ा देर लगेगी |

पत्थर की मूर्त में, उन्होंने मुझे विठाया है,

फूलों के हारों से…. मुझे सजाया है,

उन्हें संदेश भिजवाना है…….. थोड़ा देर लगेगी |

_______________

हरदम हरपल वो मेरे दीवाने हैं,

मेरे लिए सहते वो, दुनिया के तानें हैं,

मुझे उन्हें बताना है……. थोड़ा देर लगेगी |

_______________

सोलह श्रंगारों से वो मुझे रिझाते हैं,

छप्पन भोगों से वो मुझे मनाते हैं,

उन्हें विश्वास दिलाना है………उनकी तकदीर जगेगी|

मुझे भक्तों घर जाना है ,  थोडा देर लगेगी ;

उन्हें अपना बनाना है ,  थोड़ा देर लगेगी |

जय जय राधे श्याम !!!!!

∼लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

 

             

हिन्दी में राधा -कृष्ण का भजन(जन्माष्टमी)

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गौरी – गौरी राधिका के, सांवरो मन भा गयो ,

कोमल सा दिल देखो, उनके दिल पे छा गयो—2 |

मोर मुकुट उनपे कैसो दमके,

अम्बर में जैसो कोई चाँद चमके,

ऐसो चंद सा मुकुट, उनके मन को भा गयो,

कोमल सा दिल देखो, उनके दिल पे छा गयो |

 

हाथ में बंसी देखो कैसी चमके,

आसमा में जैसो, इन्द्रधनुष लटके,

बंसी की तान,उनके मन को भा गयो,

कोमल सा दिल देखो, उनके दिल पे छा गयो |

 

गले में वैजयंती माला,कैसो सोहे,

हाथों में कंगना , देखो मन मोहे,

कंगनों की खनखन, उनके मन को भा गयो,

कोमल सा दिल देखो, उनके दिल पे छा गयो |

 

कानों में कुंडल, कैसो दमकें,

पाँव की पैज़निया देखो चमकें,

पायल की छनछन, उनके मन को भा गयो,

कोमल सा दिल देखो, उनके दिल पे छा गयो |

 

राधा संग श्याम देखो कितना दमकें,

राधे के लिए ही तो इतना चमकें,

राधा का श्रृंगार, श्याम मन भा गयो,

कोमल सा दिल देखो, उनके दिल पे छा गयो –2 |

जय  जय  राधे  श्याम ! ! !

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

 

 

अधूरे सपने

 

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यह कहानी उन नारियों की है जो अपने लिए सपना तो देखती हैं लेकिन किन्हीं कारणों से उनको पूरा नहीं कर पाती  हैं |फिर भी आस नहीं छोड़तीं |


सपना संजोया था जो दिल में, पाने का अवसर पाया नहीं ;

पंख लगाए थे जो उड़ान को,उड़ने का अवसर आया नहीं |

अपनों के लिए जीने की आदत हो गई,अपने लिए जीना आया नहीं ;

अमृत पिलाती रही सबको, अमृत पीना मुझे आया नहीं |

मंज़िल तो दिख रही थी, रस्ते पर चलना आया नहीं ;

कदम उठे भी तो कभी , कदम आगे बढ़ाना  मुझे आया नहीं |

अनगिनत उलझनों से गुजरकर, उलझन सुलझाना आया नहीं ;

खरा उतरने की कोशिश में, खरा उतरना मुझे आया नहीं |

वक्त दिया है सबको मैंने, वक्त पाना मुझे आया नहीं ;

मेरा अपना भी वक्त आएगा, इसलिए सपने को मैंने भुलाया नहीं |

 ∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

आज की बारिश

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सुबह के ६:०० बजे  …… ऑफिस का दिन ……धुंआधार बारिश …….

बारिश को देख मेरे मन की दशा ………………………

 

बिजली कड़क रही थी, आसमां में बड़ी हलचल थी ;

मेघा भर – भर पानी ला रहे,  बारिश भी पूरी ज़िद में थी |

इस धुंआधार बारिश ने, मन को मेरे मोह लिया;

पागल मन ने तरह – तरह के सपनो को संजो लिया |

छत पर चढ़ कर ,आसमा से गिरती बूंदों संग गुनगुना लूँ ;

या बालकनी में खड़े होकर, ज़मी पर थिरकती बूंदों से बतिया लूँ |

लेकिन ………..

इक उज्ज्वल मोती ने, सोच को मेरी झकझोड़ दिया ;

याद आया, आज छुट्टी नहीं, ऑफिस का समय हो गया |

इतनी बारिश में ऑफिस ??????  लेकिन अगले ही पल लगा बारिश कुछ कह रही है ……..

जो आज हिम्मत अपनी, जुटा जाएगा , वो सामना मेरा कर पाएगा ;

जो आज मुझसे, लड़ा ही नहीं , वो मुझसे हारा हुआ कहलाएगा |

 

∼ लक्ष्मी मित्तल

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अमृतसर ट्रेन हादसा

दीपावली अभी आई ही नहीं, दीपक अभी जले ही थे कहाँ ;

मगर घरों के दीपक बुझ गए, ऐसा हुआ अमृतसर ट्रेन हादसा |

गए थे रावण दहन देखने, पुतला पूरा जला ही था कहाँ  ;

मगर घरों के दीपक जल गए, ऐसा हुआ अमृतसर ट्रेन हादसा |

तूफ़ान बनके गुजरी, मानो साप बनके है डसा ;

खौफनाक मंजर बन गया, ऐसा हुआ अमृतसर ट्रेन हादसा |

शोर वो जलते पटाखों का है या, गूँज वो सीटी की है क्या ;

जब तक समझ में आती, ट्रेन बन गई जानलेवा बादशाह |

कोई था बेटा… कोई था भाई, कहीं बालक कंधे पर चढ़ा ;

कोई  थी पत्नी या कोई बहन, सबके लिए हादसा बना कालदशा |

कौन बचता … किसको बचाता, चारों ओर चीत्कार गूँज उठा ;

पलक झपकते ही खत्म था सब, मौत बनकर आया हादसा |

इक ओर रावण जल रहा था, दूजी ओर दर्शकों की दुर्दशा ;

अपनों का अपनों को पहचानना मुश्किल,  भयानक यह हादसा |

किसको दोषी ठहराएँ… किसकी लापरवाही बताएँ, दिल जल रहा भारत का ;

सीखना होगा सबक सभी को, ताकि फिर कभी भी न दोहराया जाए यह हादसा |

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

 

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नवरात्रों की शुभकामनाएँ

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न जाने क्या कशिश है माँ के प्यार में

लम्बी दूरियां……. छोटी बन जाती हैं

देने पे आती………… जब मैया रानी

झोलियाँ भी….. छोटी…. पड़ जाती हैं

∼ लक्ष्मी मित्तल 

 

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